मित्रों, आज भारत जाग उठा है यह किसी से छिपा नहीं है। पुराने औपनिवेशिक वातावरण में पले बढ़े हमारी पिता और दादा जी की पीढ़ी अंग्रेजी मानसिकता की गुलाम रही है, लेकिन इस समय अधेड़ उम्र की पीढ़ी अंग्रेजी प्रभाव में रहते हुए भी स्वतंत्र राष्ट्रवादी चेतना लिए आगे बढ़ी है लेकिन जो अंग्रेजी मानसिकता के प्रभाव में थे वे कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े । परिणाम आप देख ही रहे हैं कि देश में आज दो विचारधाराएं बह रही हैं। एक देशविरोधी सैकुलर समाजवादी विचारों का भ्रामक गठबंधन जो कम्युनिस्ट सोच से प्रभावित है तथा दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना लिए हुए भारतीय संस्कृति के वाहक। आजादी के इन ७५ वर्षों में इन दोनों धाराओं में काफी मनमुटाव रहा जिसमें अभी तक कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों ने सेक्युलरिजम के नाम पर हमारी राष्ट्रीय चेतना को को हमेशा दबाए रखा। लेकिन भारतीय जनमानस ने २०१४ में जो ऐतिहासिक परिवर्तन लाकर एक ऐसे व्यक्ति को सत्ता सौंप दी जो बेझिजक मां गंगा की आरती करता दिखता है, केदारनाथ के दर्शन कर वहां गुफा में ध्यान लगाए दिखाई देता है, भगवान राम के मंदिर का मार्ग प्रशस्त कर उसका शिलान्यास वैदिक मंत्रों से करता है और ऐसे अनेक परिदृश्य प्रस्तुत करता है तो दिखावटी सेक्युलर समाजवादी समाज के भीतर से एक भयंकर चीख सी निकलती है जो आजकल हमें यत्र-तत्र दिखाई देता है । इन लोगों की एक ही रट है अभिव्यक्ति की आजादी जिसके नाम पर ये हर उस विचार का विरोध करते दिखते हैं जिसमें भारतीय संस्कृति का बिंब हो। चाहे भारतीय शिल्प हो, भारतीय ज्ञान विज्ञान हो, पौराणिक इतिहास हो या संस्कृत
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